नई दिल्ली- दिल्ली के ग्रेटर कैलाश-1 इलाके में साइबर ठगों ने खुद को टेलीकॉम और पुलिस अधिकारी बताकर एक एनआरआई बुजुर्ग डॉक्टर दंपति से 14.85 करोड़ रुपये की ठगी कर ली। ठगों ने फोन और वीडियो कॉल के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोप लगाए और गिरफ्तारी का डर दिखाकर दंपति को मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया।
ठगों ने सबसे पहले महिला डॉक्टर को फोन कर खुद को ट्राई का अधिकारी बताया और कहा कि उनके मोबाइल नंबर से आपत्तिजनक कॉल किए गए हैं। इसके बाद बातचीत को पुलिस जांच से जोड़ते हुए कहा गया कि महाराष्ट्र में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज है और गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुके हैं। कॉल को वीडियो कॉल में बदला गया, जहां सामने पुलिस की वर्दी पहने एक व्यक्ति दिखाई दिया।
वीडियो कॉल पर मौजूद व्यक्ति ने दावा किया कि डॉक्टर के नाम से केनरा बैंक में एक फर्जी खाता खोला गया है, जिसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग में हुआ है। ठगों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला बताते हुए चेतावनी दी कि सहयोग न करने पर पूरे परिवार को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
पीड़िता डॉक्टर इंदिरा तनेजा ने बताया कि उन्होंने ठगों को बताया था कि उनके पति एम्स में सर्जरी के बाद स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं और वह अकेली हैं। इसके बावजूद ठगों ने दबाव कम नहीं किया। लगातार कॉल और वीडियो कॉल कर उन्हें डराया जाता रहा और कहा गया कि जांच पूरी होने तक वह किसी से बात नहीं कर सकतीं। इसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ की प्रक्रिया बताया गया।
ठगों ने भरोसा दिलाने के लिए फर्जी दस्तावेज, कानूनी शब्दावली और पुलिस जैसी भाषा का इस्तेमाल किया। उनसे कहा गया कि अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए उन्हें बताए गए बैंक खातों में रकम ट्रांसफर करनी होगी। भारी मानसिक तनाव और डर के कारण डॉक्टर दंपति ने अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए कुल 14.85 करोड़ रुपये आठ अलग-अलग बैंक खातों में भेज दिए।
जब डॉक्टर इंदिरा तनेजा बैंक में रकम ट्रांसफर करने पहुंचीं, तो इतनी बड़ी राशि देखकर बैंक मैनेजर और कर्मचारियों को शक हुआ। उन्होंने कई सवाल पूछे, लेकिन पीड़िता ने वही जानकारी दी, जो ठगों ने उन्हें बताने के लिए कहा था।
डॉक्टर ओम तनेजा और उनकी पत्नी लगभग 48 वर्षों तक अमेरिका में रहकर संयुक्त राष्ट्र में सेवा दे चुके हैं। वर्ष 2015 में रिटायरमेंट के बाद वे भारत लौटे और सामाजिक व चैरिटेबल कार्यों से जुड़ गए। ठग कभी दो करोड़ तो कभी दो करोड़ दस लाख रुपये जैसी अलग-अलग रकम ट्रांसफर करने का निर्देश देते रहे।
आईएफएसआई के डीसीपी विनीत कुमार ने बताया कि डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का एक खतरनाक तरीका है। इसमें ठग सरकारी एजेंसियों के नाम पर लोगों को डराकर उनसे पैसे ऐंठते हैं। उन्होंने साफ किया कि कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर न तो गिरफ्तारी की धमकी देती है और न ही जांच के नाम पर पैसे मांगती है। ऐसे किसी भी कॉल की सूचना तुरंत पुलिस और बैंक को देनी चाहिए।
आरएमएल अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. लोकेश शेखावत ने कहा कि भय और घबराहट इंसान की सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित कर देती है। साइबर ठग जानबूझकर पीड़ित को जल्दबाजी और मानसिक दबाव में रखते हैं, जिससे वह सही फैसला नहीं ले पाता। ऐसी स्थिति में शांत रहना और किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना बेहद जरूरी है।







